(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.121. अध्यायः 121
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
पाण्डोः कुन्त्या विवाहः॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 1-121-0x(731)(5354)
सत्वरूपगुणोपेता धर्मारामा महाव्रता।
दुहिता कुन्तिभोजस्य पृथा पृथुललोचना॥ 1-121-1(5355)
तां तु तेजस्विनीं कन्यां रूपयौवनशालिनीम्।
व्यावृण्वन्पार्थिवाः केचिदतीव स्त्रीगुणैर्युताम्॥ 1-121-2(5356)
ततः सा कुन्तिभोजेन राज्ञाहूय नराधिपान्।
पित्रा स्वयंवरे दत्ता दुहिता राजसत्तम॥ 1-121-3(5357)
ततः सा रङ्गमध्यस्थं तेषां राज्ञां मनस्विनी।
ददर्श राजशार्दूलं पाण्डुं भरतसत्तमम्॥ 1-121-4(5358)
सिंहदर्पं महोरस्कं वृषभाक्षं महाबलम्।
आदित्यमिव सर्वेषां राज्ञां प्रच्छाद्य वै प्रभाः॥ 1-121-5(5359)
तिष्ठन्तं राजसमितौ पुरन्दरमिवापरम्।
तं दृष्ट्वा साऽनवद्याङ्गी कुन्तिभोजसुता शुभा॥ 1-121-6(5360)
पाण्डुं नरवरं रङ्गे हृदयेनाकुलाऽभवत्।
ततः कामपरीताङ्गी सकृत्प्रचलमानसा॥ 1-121-7(5361)
व्रीडमान स्रजं कुन्ती राज्ञः स्कन्धे समासजत्।
तं निशम्य वृतं पाण्डुं कुन्त्या सर्वे नराधिपाः॥ 1-121-8(5362)
यथागतं समाजग्मुर्गजैरश्वै रथैस्तथा।
ततस्तस्याः पिता राजन्विवाहमकरोत्प्रभुः॥ 1-121-9(5363)
स तया कुन्तिभोजस्य दुहित्रा कुरुनन्दनः।
युयुजेऽमितसौभाग्यः पौलोम्या मघवानिव॥ 1-121-10(5364)
कुन्त्याः पाण्डोश्च राजेन्द्र कुन्तिभोजो महीपतिः।
कृत्वोद्वाहं तदा तं तु नानावसुभिरर्चितम्।
स्वपुरं प्रेषयामास स राजा कुरुसत्तम॥ 1-121-11(5365)
ततो बलेन महता नानाध्वजपताकिना।
स्तूयमानः स चाशीर्भिर्ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः॥ 1-121-12(5366)
संप्राप्य नगरं राजा पाण्डुः कौरवनन्दनः।
न्यवेशत तां भार्यां कुन्तीं स्वभवने प्रभुः॥ ॥ 1-121-13(5367)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 121 ॥


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